कभी पाकिस्तान का रणनीतिक रूप से बेहद अहम ग्वादर पोर्ट भारत के पास भी आ सकता था, लेकिन इतिहास में दर्ज एक फैसले ने इसकी दिशा बदल दी। रिपोर्ट के मुताबिक, 1950 के दशक में ओमान के सुल्तान की ओर से ग्वादर को भारत को बेचने का प्रस्ताव आया था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में 1958 में पाकिस्तान ने ग्वादर को ओमान से खरीद लिया और आज यही जगह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC का एक अहम हिस्सा है।

ग्वादर उस समय आज जैसा बड़ा बंदरगाह नहीं था, बल्कि ओमान के नियंत्रण में रहने वाला एक छोटा-सा मछली पकड़ने वाला इलाका था। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक ओमान के सुल्तान के पास यह क्षेत्र करीब 1783 से 1958 तक रहा। भारत द्वारा प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद पाकिस्तान ने इसे लगभग 30 लाख पाउंड में खरीदा। आज इसी ग्वादर को चीन ने बड़े रणनीतिक और आर्थिक प्रोजेक्ट के केंद्र में ला दिया है।
अब कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यहां से शुरू होता है। चीन के लिए ग्वादर सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है, बल्कि यह China-Pakistan Economic Corridor का समुद्री सिरा है। CPEC के जरिए चीन के पश्चिमी हिस्से, खासकर शिनजियांग, को अरब सागर तक जोड़ने की कोशिश की गई है। ग्वादर चीन को मध्य पूर्व से आने वाले ऊर्जा संसाधनों के लिए एक वैकल्पिक समुद्री रास्ते की रणनीतिक संभावना भी देता है और इसी वजह से इसकी भौगोलिक स्थिति बेहद अहम मानी जाती है।
अगर उस समय भारत ग्वादर हासिल कर लेता, तो आज दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया का रणनीतिक समीकरण काफी अलग दिखाई दे सकता था—हालांकि यह कहना कि इससे CPEC निश्चित रूप से बन ही नहीं पाता, एक अनुमान है। ग्वादर CPEC का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन CPEC केवल एक बंदरगाह पर निर्भर प्रोजेक्ट नहीं है। फिर भी भारत के पास यह रणनीतिक जगह होती तो चीन और पाकिस्तान के लिए अरब सागर में मौजूदा रणनीतिक स्थिति बनाना निश्चित रूप से अलग चुनौती पैदा कर सकता था।
दिलचस्प बात यह है कि आज भारत चीन की इस रणनीतिक बढ़त का मुकाबला करने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट में भी निवेश कर रहा है। चाबहार भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का एक वैकल्पिक रास्ता देता है और इसे कई विश्लेषकों ने ग्वादर तथा CPEC के संदर्भ में महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प माना है। यानी जिस ग्वादर को लेकर आज भारत में नेहरू के पुराने फैसले पर बहस होती है, उसी व्यापक क्षेत्र में भारत अब चाबहार के जरिए अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, ‘नेहरू की गलती’ वाला निष्कर्ष मुख्यतः राजनीतिक और रणनीतिक व्याख्या है, क्योंकि 1950 के दशक में ग्वादर को खरीदने के संभावित सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक परिणाम आज से बिल्कुल अलग होते। इसलिए यह कहना ज्यादा सटीक है कि भारत ने उस समय एक संभावित रणनीतिक अवसर हासिल नहीं किया, जिसका महत्व दशकों बाद ग्वादर के चीन-पाकिस्तान कनेक्शन के मजबूत होने के साथ कहीं ज्यादा दिखाई देने लगा।
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