ओडिशा के अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन की कहानी ने पूरे देश को झकझोर दिया है। एक ट्रिपल मर्डर केस में दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी के 22 साल जेल में बिताए, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेगुनाह करार देते हुए बरी कर दिया। फैसले के साथ ही शीर्ष अदालत ने न्याय व्यवस्था की गंभीर खामियों पर भी कड़ी टिप्पणी की।

मामला साल 2004 के ट्रिपल मर्डर केस का है। ट्रायल कोर्ट ने 2006 में अर्जुन जानी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में उन्होंने ओडिशा हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन 3,157 दिन की देरी का हवाला देकर हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई ही नहीं की। इस कारण उन्हें करीब 10 साल और जेल में रहना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि हाईकोर्ट को यह देखना चाहिए था कि अपील जेल से दायर की गई थी और आरोपी पहले ही 12 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में तकनीकी आधार पर अपील खारिज करने के बजाय उसके गुण-दोष के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट ने केस के सबूतों की भी दोबारा जांच की। अदालत ने पाया कि पूरी सजा मुख्य रूप से एक ऐसे चश्मदीद गवाह की गवाही पर आधारित थी, जिसे विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। साथ ही कथित कबूलनामा भी कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं था। इन्हीं कारणों से अदालत ने अर्जुन जानी को संदेह का लाभ नहीं, बल्कि पूरी तरह बेगुनाह मानते हुए बरी कर दिया।
फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाशिए पर रहने वाले और गरीब लोगों के लिए न्याय तक पहुंच आज भी बड़ी चुनौती है। अदालत ने यह भी माना कि अर्जुन जानी की जिंदगी के 22 साल न्यायिक व्यवस्था की खामियों की वजह से चले गए। कोर्ट ने जिला प्रशासन और विधिक सेवा प्राधिकरण को उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया।
इस फैसले के बाद एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया, जांच एजेंसियों की भूमिका और समय पर सुनवाई को लेकर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल मानी जा रही है।
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