तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील गुप्ता ने कुख्यात अपराधी रंगा की फांसी से जुड़ा एक ऐसा किस्सा सुनाया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। उनके मुताबिक, फांसी दिए जाने के बाद भी रंगा की मौत तुरंत नहीं हुई और स्थिति सामान्य होने में काफी समय लगा।

सुनील गुप्ता ने बताया कि नियमों के तहत फांसी के बाद डॉक्टरों की टीम ने जांच की, लेकिन रंगा के मामले में प्रक्रिया अपेक्षा से ज्यादा लंबी चली। उन्होंने दावा किया कि करीब दो घंटे बाद जाकर उसकी मौत की पूरी तरह पुष्टि हो सकी।
पूर्व जेलर के अनुसार, इस दौरान जेल प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। डॉक्टर लगातार निगरानी करते रहे और कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी की गईं। जब तक चिकित्सकीय पुष्टि नहीं हुई, तब तक आगे की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई।
सुनील गुप्ता ने यह भी कहा कि मौत की सजा की पूरी प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और सख्त नियमों के तहत होती है। इसमें किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं की जाती और हर कदम कानून के अनुसार उठाया जाता है।
रंगा और बिल्ला का मामला देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में गिना जाता है। दोनों को 1978 के चर्चित गीता और संजय चोपड़ा अपहरण एवं हत्या मामले में दोषी ठहराया गया था और बाद में तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी।
पूर्व जेलर का यह खुलासा अब फिर चर्चा में है। हालांकि यह उनका व्यक्तिगत अनुभव और वर्णन है, जिसे उन्होंने एक इंटरव्यू में साझा किया। इस बयान के बाद तिहाड़ जेल और उस ऐतिहासिक मामले को लेकर लोगों की दिलचस्पी एक बार फिर बढ़ गई है।
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