न वकील की डिग्री, न LLB का तमगा… फिर भी बन गए देश के मुख्य न्यायाधीश! अंग्रेजों के जमाने के ICS अफसर का ऐसा जलवा कि आज भी मिसाल दी जाती है

आज के दौर में कानून की पढ़ाई और डिग्री के बिना अदालत में करियर की कल्पना करना मुश्किल लगता है, लेकिन भारत के इतिहास में एक ऐसे शख्स भी रहे, जो बिना औपचारिक कानून की डिग्री के देश के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक पहुंचे। उनका नाम था कैलाश नाथ वांचू, जिन्हें के.एन. वांचू के नाम से भी जाना जाता है। वह भारत के 10वें मुख्य न्यायाधीश बने थे।

कैलाश नाथ वांचू ने इलाहाबाद से बीए किया और साल 1924 में भारतीय सिविल सेवा यानी ICS की परीक्षा पास की। उस दौर में ICS को ब्रिटिश शासन की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में गिना जाता था। वांचू ने प्रशासनिक सेवा से अपना करियर शुरू किया और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में संयुक्त मजिस्ट्रेट तथा जिला एवं सत्र न्यायाधीश के तौर पर काम किया। यहीं से उनके न्यायिक सफर की नींव पड़ी।

साल 1947 में वांचू इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। उनके पास कानून की औपचारिक डिग्री नहीं थी, लेकिन प्रशासनिक अनुभव और न्यायिक कामकाज की समझ ने उन्हें लगातार आगे बढ़ाया। यही वजह थी कि उनका नाम देश के सबसे ऊंचे न्यायिक पद तक पहुंचने वाले लोगों में दर्ज हो गया।

11 अगस्त 1958 को वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त हुए। इसके करीब नौ साल बाद, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के. सुब्बाराव के इस्तीफे के बाद 12 अप्रैल 1967 को कैलाश नाथ वांचू ने भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला। उनका कार्यकाल 24 फरवरी 1968 तक रहा। इस तरह वह देश के उन चुनिंदा न्यायविदों में शामिल हो गए, जिनकी कहानी आज भी लोगों को हैरान करती है।

वांचू की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि उन्होंने पारंपरिक कानूनी डिग्री हासिल किए बिना न्यायपालिका के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि वह कानून की समझ से दूर थे। उनकी प्रशासनिक और न्यायिक भूमिकाओं ने उन्हें कानून से जुड़े मामलों का व्यापक अनुभव दिया था। उस समय न्यायपालिका में नियुक्तियों की व्यवस्था और आज की कानूनी योग्यता संबंधी अपेक्षाओं में भी अंतर था।

आज जब डिग्री, प्रतियोगी परीक्षाओं और योग्यता को लेकर लंबी बहस होती है, तब कैलाश नाथ वांचू का उदाहरण इतिहास का एक अनोखा अध्याय याद दिलाता है। ICS अधिकारी से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और फिर भारत के CJI तक पहुंचने वाला उनका सफर बताता है कि उस दौर में न्यायिक नियुक्तियों का रास्ता आज से काफी अलग था। बिना LLB के देश के मुख्य न्यायाधीश बनने की उनकी कहानी इसी वजह से आज भी लोगों की उत्सुकता बढ़ाती है।

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