मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। राहुल गांधी और विपक्षी दल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं, तो केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के पुराने कार्यकाल का हिसाब सामने रख दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज जिस चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है, उसके शासनकाल में चुनाव आयुक्तों को ही राजनीतिक पद दिए गए थे।

पीयूष गोयल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र और स्वायत्त तरीके से काम करने दिया है। उनके मुताबिक, मौजूदा सरकार ने किसी चुनाव आयुक्त को राजनीतिक फायदा पहुंचाने की कोशिश नहीं की। गोयल ने राहुल गांधी के रवैये को बचकाना बताते हुए कहा कि कांग्रेस को दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपना पुराना रिकॉर्ड भी देखना चाहिए।
गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का उदाहरण देते हुए दावा किया कि कांग्रेस ने 1999 में उन्हें लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट दिया था। उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल का भी जिक्र किया और आरोप लगाया कि रिटायरमेंट के बाद गिल कांग्रेस में शामिल हुए, राज्यसभा पहुंचे और फिर केंद्रीय मंत्री बनाए गए। गोयल ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे कदम चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े नहीं करते?
केंद्रीय मंत्री ने टीकाराम मीणा और केरल के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी रतन यू. केलकर का नाम लेते हुए भी राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि चुनावी जिम्मेदारियां निभाने वाले अधिकारियों को बाद में राजनीतिक या सरकारी पदों पर जगह दी गई। हालांकि, ये पीयूष गोयल के आरोप और उनकी राजनीतिक दलीलें हैं; इनसे अपने आप किसी अधिकारी की निष्पक्षता या किसी चुनाव में गड़बड़ी साबित नहीं होती।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी गोयल ने कांग्रेस को घेरा। उन्होंने कहा कि पहले सरकार अपनी पसंद के व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त बना सकती थी, जबकि 2023 में मोदी सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा कानून बनाया, जिसमें चयन समिति में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष को भी शामिल किया गया। कांग्रेस और विपक्ष का मौजूदा विवाद इसी व्यापक सवाल से जुड़ा है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित हो और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच कैसे हो।
वहीं, राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेता विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुका है, जबकि चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों को लेकर राजनीतिक टकराव जारी है। अब सवाल यही है कि यह बहस पुराने कार्यकाल के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहेगी या मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर भी कोई ठोस जवाब सामने आएगा?
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