चीन ने अंतरिक्ष की दुनिया में ऐसा तकनीकी कारनामा किया है, जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। चीन के घरेलू सैटेलाइट नेटवर्क Guowang के जरिए आर्कटिक यानी उत्तरी ध्रुव से अंटार्कटिका यानी दक्षिणी ध्रुव तक वीडियो कॉल की गई। सबसे खास बात यह रही कि कॉल में देरी एक सेकंड से भी कम बताई गई। अब इसे एलन मस्क की Starlink को चुनौती देने की दिशा में चीन का बड़ा कदम माना जा रहा है।

यह परीक्षण सितंबर 2026 के आखिर में चीन के 16वें आर्कटिक महासागर अभियान के दौरान किया गया। इसमें आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद चीनी शोध जहाजों और अंटार्कटिका के किनलिंग रिसर्च स्टेशन के बीच वीडियो कॉल हुई। चीन के सरकारी प्रसारक CCTV के मुताबिक, इस प्रयोग ने बेहद दुर्गम ध्रुवीय इलाकों में सैटेलाइट के जरिए संपर्क बनाए रखने की क्षमता दिखाई है।
इस तकनीक का नाम Guowang सैटेलाइट नेटवर्क है, जिसे चीन अपनी स्वतंत्र सैटेलाइट इंटरनेट व्यवस्था के तौर पर विकसित कर रहा है। परीक्षण के दौरान अपलोड और डाउनलोड की अधिकतम गति करीब 30 Mbps दर्ज की गई। इसका इस्तेमाल केवल वीडियो कॉल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शोध जहाजों से डेटा फाइलें और समुद्री यात्रा से जुड़े रिकॉर्ड भेजने के लिए भी किया गया।
चीन की योजना इस नेटवर्क को बहुत बड़े स्तर पर फैलाने की है। रिपोर्ट के मुताबिक, Guowang के तहत करीब 12,992 सैटेलाइट तैनात करने की योजना है। हालांकि, अभी यह नेटवर्क शुरुआती चरण में है और अक्टूबर 2026 तक इसके 180 से कुछ अधिक सैटेलाइट ही कक्षा में पहुंच पाए थे। यानी एक सफल परीक्षण जरूर हुआ है, लेकिन पूरी दुनिया में मजबूत कवरेज देने का लक्ष्य अभी काफी दूर है।
दूसरी ओर, एलन मस्क की Starlink पहले से ही हजारों सैटेलाइट के जरिए दुनिया के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवा दे रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, Starlink के नेटवर्क में करीब 11,000 सैटेलाइट हैं, जिससे फिलहाल उसे कवरेज और नेटवर्क क्षमता के मामले में बड़ी बढ़त हासिल है। चीन का Guowang अभी उस स्तर पर नहीं पहुंचा है, लेकिन यह परीक्षण बताता है कि बीजिंग इस क्षेत्र में अपनी अलग तकनीकी ताकत खड़ी करना चाहता है।
अब सवाल यह है कि क्या चीन आने वाले वर्षों में Starlink को असली चुनौती दे पाएगा? ध्रुवों के बीच एक सेकंड से कम देरी वाली वीडियो कॉल निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क बनाने के लिए हजारों सैटेलाइट, व्यापक कवरेज, भरोसेमंद कनेक्टिविटी और बेहतर क्षमता की जरूरत होगी। फिलहाल चीन ने अपना दावा पेश कर दिया है, मगर अंतरिक्ष के इस मुकाबले में असली परीक्षा अभी बाकी है।
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