महिला के ऊपर लेटा, मुंह दबाया… फिर भी ‘रेप की कोशिश’ का आरोप नहीं माना! पटना हाईकोर्ट के फैसले ने छेड़ी नई बहस

बिहार के बेगूसराय में करीब 16 साल पुराने मामले पर पटना हाईकोर्ट के फैसले ने एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। अदालत ने कहा कि महिला के ऊपर लेटना और उसका मुंह दबाना अपने आप में दुष्कर्म की कोशिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी की हरकतों को अपराध माना और महिला की मर्यादा भंग करने के मामले में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी। फैसले के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास का आरोप क्यों हटाया?

यह मामला 8 फरवरी 2010 की रात का है। बेगूसराय में एक विधवा महिला अपने बच्चे के साथ घर में सो रही थी। आरोप था कि उसी गांव का एक अधेड़ व्यक्ति गलत नीयत से उसके घर में घुसा, जलता हुआ दीया बुझाया और महिला के ऊपर लेट गया। महिला ने शोर मचाया तो आरोपी ने उसका मुंह दबा दिया। आवाज सुनकर आसपास के लोग पहुंचे और आरोपी को पकड़ लिया। इसके बाद उसकी पिटाई भी की गई।

महिला ने पहले गांव की पंचायत के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन आरोपी के नहीं पहुंचने पर उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया। शिकायत के बाद पुलिस ने केस दर्ज किया और जांच पूरी कर दुष्कर्म की कोशिश का आरोप लगाया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए चार साल छह महीने की सश्रम कैद सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी।

8 अक्टूबर 2026 को जस्टिस संदीप कुमार की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि दुष्कर्म की कोशिश साबित करने के लिए आरोपी की गलत नीयत के साथ ऐसे ठोस कृत्य भी साबित होने चाहिए, जो अपराध को उस दिशा में आगे बढ़ाते हों। अदालत के मुताबिक, इस मामले में महिला के ऊपर लेटना और उसका मुंह दबाना उसकी मर्यादा भंग करने वाली हरकतें थीं, लेकिन उपलब्ध सबूतों से दुष्कर्म के प्रयास का आरोप साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कपड़े उतारने या दुष्कर्म की दिशा में आगे बढ़ने का कोई ठोस सबूत नहीं था।

हाईकोर्ट ने दुष्कर्म की कोशिश के आरोप में दी गई सजा रद्द कर दी, लेकिन महिला की मर्यादा भंग करने और घर में अनधिकृत रूप से घुसने के अपराध में दोषसिद्धि बरकरार रखी। आरोपी की सजा पहले से जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दी गई और उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। अदालत ने महिला को मुआवजा देने का भी आदेश दिया। यानी आरोपी को पूरी तरह बरी नहीं किया गया, बल्कि अपराध की कानूनी श्रेणी और सजा में बदलाव किया गया।

इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यौन अपराधों में आरोपी की मंशा, उसके कृत्य और उपलब्ध सबूतों को अदालत किस तरह परखती है। ऐसे मामलों में कानूनी कसौटी तय करना अदालत का काम है, लेकिन फैसलों की व्याख्या पर सार्वजनिक बहस भी होती है। इस मामले में अदालत ने आरोपी की हरकतों को अपराध माना, मगर दुष्कर्म की कोशिश का आरोप साबित नहीं माना। अब यही कानूनी अंतर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

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