संसद के मौजूदा सत्र में मोदी सरकार के सामने FCRA संशोधन विधेयक और परिसीमन (Delimitation) जैसे अहम मुद्दों पर नया राजनीतिक समीकरण बनता दिखाई दे रहा है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन क्षेत्रीय दलों के समर्थन की उम्मीद की जा रही थी, उनके रुख को लेकर अब नई अटकलें तेज हो गई हैं। इससे संसद के अंदर सरकार की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, DMK, समाजवादी पार्टी (SP) और शरद पवार गुट की NCP का रुख इन विधेयकों पर बेहद अहम माना जा रहा है। अगर इन दलों का समर्थन सरकार को नहीं मिलता, तो राजनीतिक गणित बदल सकता है। हालांकि संबंधित दलों की अंतिम रणनीति संसद में चर्चा और मतदान के दौरान ही साफ होगी।
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का असर कई गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और विदेशी फंडिंग पाने वाले संस्थानों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और विदेशी फंड के इस्तेमाल पर बेहतर निगरानी रखना है।
वहीं परिसीमन का मुद्दा भी सियासी बहस के केंद्र में है। दक्षिण भारत के कई दल पहले ही आशंका जता चुके हैं कि नई सीटों के बंटवारे से उनके राज्यों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के हिसाब से रणनीति बना रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के इस सत्र में सिर्फ विधेयकों पर ही नहीं, बल्कि दलों के बदलते समीकरणों पर भी सबकी नजर रहेगी। अगर कुछ क्षेत्रीय दल अपना रुख बदलते हैं, तो इसका असर आने वाले बड़े विधेयकों और सरकार की रणनीति पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सभी की निगाह संसद की आगामी कार्यवाही पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि FCRA संशोधन विधेयक और परिसीमन जैसे अहम मुद्दों पर कौन-सा दल किसके साथ खड़ा होता है और सरकार इन विधेयकों को पारित कराने के लिए कैसी राजनीतिक रणनीति अपनाती है।
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