इंदौर गैस पाइपलाइन ब्लास्ट केस में SDM ने कोर्ट में मांगी माफी, झूठे हलफनामे पर हाईकोर्ट सख्त; कहा- नगर निगम और शासन दोनों जिम्मेदार

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इंदौर के सुमन नगर गैस पाइपलाइन ब्लास्ट केस में अब एक नया और बड़ा मोड़ सामने आया है। 23 जून 2026 को हुए इस हादसे को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रशासन की ओर से दाखिल किए गए गलत हलफनामे का मामला सामने आया, जिसके बाद SDM घनश्याम धांगर ने कोर्ट के सामने माफी मांगी। यह मामला पहले से ही गंभीर था, क्योंकि गैस पाइपलाइन में धमाके के बाद कई लोग झुलस गए थे और हादसे में प्रशासनिक लापरवाही के आरोप भी लगाए जा रहे थे। अब कोर्ट में गलत जानकारी दिए जाने को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

दरअसल, इस मामले में घायलों के इलाज और उनके मेडिकल खर्च को लेकर भी विवाद चल रहा है। पीड़ितों की ओर से हाईकोर्ट में बताया गया कि उन्हें इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ रहा है, जबकि पहले प्रशासन और नगर निगम की तरफ से इलाज का खर्च उठाने की बात कही गई थी। कोर्ट को यह भी बताया गया कि नगर निगम के जवाब से ऐसा लग रहा था जैसे अस्पतालों के बकाया बिल चुका दिए गए हों और पीड़ितों को भुगतान भी मिल चुका हो, जबकि पीड़ित पक्ष का दावा था कि असल में कोई भुगतान नहीं हुआ था।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन के रवैये पर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ किया कि गैस पाइपलाइन ब्लास्ट जैसी गंभीर घटना में घायलों के इलाज और मुआवजे को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी घायलों को समय पर उचित इलाज मिले और प्रभावित लोगों को पर्याप्त मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, कोर्ट ने मामले में जिम्मेदार विभागों और अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी जवाब मांगा है।

यह पूरा मामला उस समय और गंभीर हो गया था जब आरोप सामने आए कि गैस पाइपलाइन के पास बोरिंग का काम किए जाने के दौरान धमाका हुआ। हादसे में कई लोग गंभीर रूप से झुलसे थे और एक घायल को बेहतर इलाज के लिए अहमदाबाद तक एयरलिफ्ट करने का आदेश भी हाईकोर्ट ने दिया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि खुदाई की अनुमति, काम की निगरानी और जमीन के नीचे मौजूद गैस पाइपलाइन जैसी सुविधाओं की सुरक्षा को लेकर संबंधित विभागों के बीच तालमेल की कमी और लापरवाही रही। इसी आधार पर मामले की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग की गई है।

अब इस केस में SDM की माफी और हाईकोर्ट की सख्ती ने प्रशासन की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। कोर्ट के सामने यह सवाल भी है कि आखिर सरकारी रिकॉर्ड में गलत जानकारी कैसे पहुंची और हादसे के पीड़ितों को इलाज व मुआवजे के मामले में अब तक परेशानी क्यों उठानी पड़ रही है। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई में पूरे घटनाक्रम की तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है।

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