सोनीपत के एक वृद्धाश्रम से सामने आई एक बुजुर्ग महिला की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। दो बार शादी हुई और दोनों पति दुनिया छोड़कर चले गए, जिसके बाद जिंदगी के इस पड़ाव पर वह पूरी तरह अकेली पड़ गईं। हैरानी की बात यह है कि महिला के पास करीब ₹40 लाख की जमा पूंजी है, यानी आर्थिक रूप से वह पूरी तरह बेसहारा नहीं हैं। इसके बावजूद आज उनका अपना घर नहीं, बल्कि वृद्धाश्रम उनका ठिकाना है। महिला का आरोप है कि उनका बेटा उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता था, जिसके बाद उन्हें वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ा।

महिला की जिंदगी की कहानी पीछे मुड़कर देखें तो मुश्किलों की लंबी दास्तान नजर आती है। उनकी पहली शादी हुई, लेकिन पति की मौत के बाद उन्हें दोबारा अपनी जिंदगी संभालनी पड़ी। इसके बाद दूसरी शादी हुई और लगा कि शायद अब जिंदगी का सफर किसी साथी के साथ आगे बढ़ेगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दूसरे पति की भी मौत हो गई। वक्त गुजरता गया और वह उस उम्र में पहुंच गईं, जब इंसान को कमाई या भागदौड़ से ज्यादा किसी अपने के साथ और सहारे की जरूरत होती है। उनके पास परिवार भी था और अपनी जमा पूंजी भी, लेकिन फिर भी बुढ़ापे में उन्हें अकेले वृद्धाश्रम में रहना पड़ रहा है।
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू शायद ₹40 लाख से ज्यादा की जमा पूंजी नहीं, बल्कि बेटे को लेकर महिला की सोच है। उनका कहना है कि बेटा उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता था, इसलिए उन्हें वृद्धाश्रम आना पड़ा। इसके बावजूद उनके दिल में बेटे के लिए नाराजगी के साथ-साथ ममता आज भी बरकरार है। महिला ने कहा कि उनके जाने के बाद उनकी पूरी संपत्ति उनके बेटे को ही मिलेगी। यानी जिस बेटे के साथ आज वह नहीं रह पा रही हैं, उसी बेटे के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी और संपत्ति का हक बचाकर रखा है। यही बात इस पूरी कहानी को और ज्यादा भावुक बना देती है—शिकायत है, अकेलापन है, लेकिन मां की ममता फिर भी खत्म नहीं हुई।
आमतौर पर बुढ़ापे की सुरक्षा की बात होती है तो सबसे पहले पैसा, घर और संपत्ति का ख्याल आता है। लेकिन सोनीपत की इस महिला की कहानी दिखाती है कि ये चीजें होने के बावजूद इंसान अकेला पड़ सकता है। उनके पास करीब ₹40 लाख हैं, लेकिन साथ बैठकर हाल पूछने वाला अपना इंसान नहीं है। अपना बेटा है, लेकिन उनके मुताबिक वह उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता। यही वजह है कि वृद्धाश्रम में रहते हुए भी उनकी सबसे बड़ी जरूरत शायद पैसे की नहीं, बल्कि अपनापन और साथ की है। उनकी कहानी यह सवाल भी छोड़ती है कि क्या बुढ़ापे में सिर्फ आर्थिक सुरक्षा काफी है, या परिवार का साथ उससे कहीं ज्यादा जरूरी होता है?
सोनीपत के वृद्धाश्रम में रहने वाली इस महिला की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग की निजी जिंदगी की कहानी नहीं रह जाती। यह उन तमाम बुजुर्गों की तरफ भी ध्यान खींचती है, जिन्होंने पूरी जिंदगी परिवार के लिए लगा दी और उम्र के आखिरी पड़ाव पर अकेले रह गए। दो पति खोने के बाद भी जिंदगी संभालने वाली महिला आज ₹40 लाख की जमा पूंजी के साथ वृद्धाश्रम में है और फिर भी अपने बेटे के भविष्य की चिंता कर रही है। शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी विडंबना है—जिस बेटे के साथ आज एक छत के नीचे जिंदगी नहीं कट रही, मां फिर भी अपने जाने के बाद अपनी पूरी संपत्ति उसी के नाम करना चाहती है।
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