पति की सैलरी ₹71 हजार, फिर भी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता! बिलासपुर हाईकोर्ट ने क्यों ठुकराया दावा, जानिए पूरा मामला

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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच चल रहे एक वैवाहिक विवाद में गुजारा भत्ता और मुकदमे के खर्च को लेकर अहम फैसला सुनाया है। मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि पत्नी सरकारी नौकरी में है और उसकी मासिक सैलरी करीब ₹71,482 बताई गई है। पति ने इसी आधार पर दलील दी कि पत्नी आर्थिक रूप से खुद अपना खर्च उठा सकती है, इसलिए उसे अंतरिम गुजारा भत्ता देने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं था कि पत्नी कितना कमाती है, बल्कि यह भी था कि क्या उसकी आय के बावजूद उसे वैवाहिक मुकदमे से जुड़े जरूरी खर्च के लिए पति से मदद मिल सकती है।

मामला अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। इसी कार्यवाही के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की। पति ने आरटीआई के जरिए हासिल वेतन पर्ची का हवाला देते हुए बताया कि पत्नी सरकारी शिक्षिका है और उसे करीब ₹71 हजार से ज्यादा हर महीने मिलते हैं, जबकि उसकी अपनी आय संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी के रूप में करीब ₹25,700 प्रति माह है। पति की दलील थी कि जब पत्नी उससे कहीं ज्यादा कमा रही है, तो फिर उससे गुजारा भत्ता मांगने का सवाल ही नहीं उठता।

कुटुंब न्यायालय ने भी यह माना था कि पत्नी अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में सक्षम है, इसलिए उसे मासिक गुजारा भत्ता देने का आधार नहीं बनता। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कोर्ट ने मुकदमे की कार्यवाही में होने वाले जरूरी खर्च को अलग नजर से देखा। पत्नी को अदालत में पेश होने, यात्रा करने और मुकदमे से जुड़े खर्चों का सामना करना पड़ता है, इसलिए सिर्फ यह तथ्य कि वह खुद कमाती है, उसे हर तरह की आर्थिक सहायता से वंचित करने का आधार नहीं माना गया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए पति हाईकोर्ट पहुंचा, जहां मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की।

हाईकोर्ट ने मामले में यह फर्क साफ किया कि गुजारा भत्ता और मुकदमे का खर्च एक ही चीज नहीं हैं। पत्नी की अपनी आय इतनी है कि वह अपना भरण-पोषण कर सकती है, तो उसे नियमित अंतरिम maintenance देने की जरूरत नहीं हो सकती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वैवाहिक मुकदमे की प्रक्रिया में आने वाले जरूरी खर्चों को नजरअंदाज कर दिया जाए। अदालत ने इसी आधार पर सूरजपुर कुटुंब न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए पति की चुनौती खारिज कर दी। यानी ₹71 हजार से ज्यादा कमाने वाली पत्नी को मासिक गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा, लेकिन मुकदमे से जुड़े जरूरी खर्च के अधिकार को सिर्फ उसकी नौकरी और आय के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।

इस फैसले ने एक अहम कानूनी बात सामने रखी है—हर maintenance claim को सिर्फ पति की सैलरी देखकर तय नहीं किया जा सकता। अदालत मामले में दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, जरूरत और मुकदमे की परिस्थितियों को अलग-अलग देख सकती है। इस मामले में पत्नी की आय पति से काफी ज्यादा थी, इसलिए नियमित गुजारा भत्ता का दावा टिक नहीं पाया, लेकिन अदालत ने मुकदमे की निष्पक्ष प्रक्रिया के लिए जरूरी खर्च के अधिकार को अलग माना। यही वजह है कि बिलासपुर हाईकोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों में कमाई, maintenance और litigation expenses के बीच फर्क को लेकर खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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